कहीं पढ़ा एक शब्द "हिंसक नाद और चुप्पियां", जो बड़े गहरे तक भीतर उतर गया।
ऐसा लगा कि यही मेरी लघुकथाओं की सबसे सटीक व्याख्या है।
मेरी लघुकथाओं के भीतर और बाहर वही "हिंसक नाद" का "सन्नाटा" है,
जो वर्षों तक मेरे अंतर में गूंजता रहा,
और उन्हीं गूंजों का "अनुगूंज" है यह लघुकथा-संग्रह।
आप सबके सम्मुख इस संग्रह को प्रस्तुत करने में
श्री सागर सुमन जी का विशेष आभार है।
मां सरस्वती की कृपा के उपरांत
मैं यह संग्रह अपने माता-पिता के चरण-कमलों को
सादर समर्पित करती हूं।





Anant Ki Or
Aitbaar-E-Gazal 

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