“तुम दुल्हन बन गए: विवाह नहीं, यह तो विसर्जन है | अनुबंध EP 13.1”

"तुम दुल्हन बन गए" | क्या हर प्रतीक्षा का अंत मिलन होता है?| अनुबंध: काव्य श्रृंखला (Episode 13.1)

अनुबंध का भ्रम: क्यों ठग गए हम पागलों की तरह? – एक दार्शनिक...

अनुबंध का भ्रम: क्यों ठग गए हम पागलों की तरह"क्यों हमारा मिलन कुछ पलों का हुआ, पल विराह के असीमित युगों की तरह, तृप्ति के नाम पर बस समर्पण मिला, ठग गए जैसे हम पागलों की तरह।"