प्रिय वासुदेव बंसल “व्यग्र” जी,
आपको मैं बहुत उत्साह से जानता और पहचानता हूँ। आप जितने अच्छे रचनाकार हैं, उतने ही अच्छे व्यक्ति भी हैं। “व्यग्र के अनेक रंग” की पांडुलिपि जब मैंने पढ़ी तो पाया कि आपकी हर रचना में एक गहराई है, संवादशीलता है। चाहे वह बच्चों की कविता हो, या ग़ज़ल/मुक्तक से भरी हुई रचना, और चाहे अन्य गम्भीर विषयों पर लिखी हुई कविताएँ और लेख हों।
मैंने पहले भी कहा है कि जब तक आप मन से अच्छे व्यक्ति नहीं हैं, तब तक अच्छी कविताएँ लिख ही नहीं सकते। यही अच्छे कवि की पहली शर्त है। “व्यग्र के अनेक रंग” नामक वासुदेव बंसल “व्यग्र” जी के प्रथम संकलन में गीतों का संकलन पर्याप्त है। एक गीत बहुत अच्छा है –
मथुरा हूँ न मैं काशी हूँ
मैं तो रोटी वासी हूँ।”
यह गीत बहुत कुछ कह रहा है। इसमें बहुत बड़ा व्यक्तित्व झलक रहा है, जो यह उद्घोष कर रहा है कि चाहे कितने ही धार्मिक ढोंग हों, सब जलती आग पर ही केंद्रित हैं। इससे बड़ा कोई पूजा नहीं, इससे बड़ा कोई धर्म नहीं।
ऐसे अनेक गीत हैं जिनकी भावनाएँ भी अच्छी हैं और विचार भी अच्छे।
“व्यग्र के अनेक रंग” नामक इस पुस्तक के प्रकाशन पर मैं प्रिय वासुदेव बंसल “व्यग्र” जी को अनेक शुभकामनाएँ देता हूँ और हृदय से कामना करता हूँ कि यह पाठकों के मनोमस्तिष्क पर अंकित हो।
– गीतकार डॉ. विष्णु सक्सेना
(सिरोही, राजस्थान)






Aitbaar-E-Gazal
Antarman Ki Jharni
Dastak 

Reviews
There are no reviews yet.