अनुबंध का भ्रम: क्यों ठग गए हम पागलों की तरह? – एक दार्शनिक भावयात्रा

अनुबंध का भ्रम: क्यों ठग गए हम पागलों की तरह“क्यों हमारा मिलन कुछ पलों का हुआ, पल विराह के असीमित युगों की तरह, तृप्ति के नाम पर बस समर्पण मिला, ठग गए जैसे हम पागलों की तरह।”

प्रेम जब तक ‘पाने’ की इच्छा है, तब तक वह एक उत्सव है। लेकिन जब प्रेम ‘अस्तित्व’ का प्रश्न बन जाए, तब वह एक महाकाव्य का रूप ले लेता है। ‘अनुबंध’ की इस यात्रा में, हम अक्सर खुद को उस मोड़ पर खड़ा पाते हैं जहाँ हमें लगता है कि हम ‘ठग गए हैं’।

मिलन का क्षण और विरह के युग

हमारे जीवन में कुछ मिलन इतने तीव्र होते हैं कि वे मात्र ‘पल’ भर के लगते हैं, लेकिन उनके जाने के बाद जो विरह का समय आता है, वह असीमित युगों जैसा लंबा होता है। सांख्य दर्शन के अनुसार, यह ‘काल’ का सापेक्ष होना ही हमारी चेतना की परीक्षा है। क्षणभंगुर मिलन हमें यह सिखाने आता है कि भौतिक सुख तो केवल एक ‘प्रीपेड कनेक्शन’ की तरह है, जिसका बैलेंस खत्म होते ही संबंध की परिभाषा बदल जाती है।

तृप्ति या समर्पण?

हम अक्सर प्रेम में ‘तृप्ति’ (Satisfaction) की तलाश करते हैं, लेकिन हमें मिलता है—’समर्पण’। जब तक ‘मैं’ और ‘तुम’ के बीच तृप्ति की मांग है, तब तक हम ‘पागलों की तरह’ ठगे हुए महसूस करते हैं। जिस क्षण यह समर्पण ‘पागलपन’ से ऊपर उठकर ‘साक्षी भाव’ बन जाता है, उस दिन ‘अनुबंध’ का दर्शन समझ में आता है।

अनुबंध का भ्रम: क्यों ठग गए हम पागलों की तरह

व्योम और क्षोभ का द्वंद्व

“तुम हुए व्योम से, मैं हुआ क्षोभ सा” यहाँ ‘व्योम’ (आकाश/विस्तार) और ‘क्षोभ’ (हृदय की हलचल) का मिलन ही सृष्टि का आधार है। आप जिसे विरह का ‘पागलपन’ समझ रहे हैं, वह दरअसल उस असीम ‘व्योम’ की ओर बढ़ने का एक प्रयास है जिसे प्राप्त करने के लिए ‘क्षोभ’ का होना अनिवार्य है।

अनुबंध का भ्रम:

निष्कर्ष: क्या यह ठगा जाना है?

नहीं। यह ठगा जाना नहीं, बल्कि ‘अहंकार’ का छिलका उतरना है। जब हम पागलपन की तरह प्रेम में लुट जाते हैं, तभी हम उस शून्य (Zero Balance) को प्राप्त कर पाते हैं जहाँ से ‘सायुज्य मोक्ष’ का द्वार खुलता है।

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