फिरक–समर्थक दोहों का अनूठा संकलन
सदियों पुरानी काव्य–परंपरा में अपनी विशिष्ट पहचान बनाए रखने वाला यदि कोई नाम है तो निःसंदेह वह ‘दोहा’ है।
कोई भी कविता या नज़्म तभी तक अपनी पहचान और प्रतिष्ठा बनाए रख सकती है, जब तक वह लोक में गहरी पैठ रखे।
इस दृष्टिकोण से देखें तो दोहा निरंतर प्रासंगिक रहा है।
कम शब्दों में नीति, भक्ति, संघर्ष और जीवन–चर्या के जितने जीवंत चित्र दोहों ने खींचे हैं, उतने अन्य विधाएँ केवल विस्तृत व्याख्या के सहारे ही दिखा पाती हैं।
यदि किसी विधा ने तत्काल प्रभाव से जीवन और समाज का चित्र उकेरा है तो वे हैं दोहा–पंक्तियाँ।
ऐसे समर्थ दोहाकारों की लम्बी और समृद्ध परंपरा रही है, जिन्होंने दोहों को ऊँचाइयों तक पहुँचाने में कोई कमी नहीं छोड़ी।
वर्तमान समय में इस सूची का एक अत्यंत महत्वपूर्ण नाम हमारे सामने आता है और वह है श्री राजेश तंज़ ‘राही’ का।
श्री ‘राही’ का साहित्यिक क्षेत्र में पदार्पण कोई बहुत पुरानी घटना नहीं है, किन्तु दोहों के प्रति उनकी लगन और समर्पण ने उन्हें बहुत कम समय में ही विशिष्ट पहचान दिला दी है।
लम्बे समय से वे सामयिक घटनाओं पर प्रतिदिन 2 दोहे लिखकर अख़बारों और पत्र–पत्रिकाओं में देते रहे हैं।
Doha Chhand Basesd Coollection for fathers







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