‘कर लिया था चयन|अनुबंध: नियति, समर्पण और एक आत्मिक मिलन की अमर गाथा | नियति का काव्य | Kavi Sagar Suman | Anubandh काव्य श्रृंखला | EP 12 से एक छंद |

अनुबंध: नियति, समर्पण और एक आत्मिक मिलन की अमर गाथा

जीवन एक प्रवाह है, एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया, जिसे हम अक्सर समझ नहीं पाते। लेकिन कभी-कभी, जीवन के किसी मोड़ पर ठहरकर जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो हमें एक अदृश्य सूत्र दिखाई देता है। वह सूत्र, जो हमारी हर घटना, हर निर्णय और हर मिलन को एक अर्थ देता है। सागर सुमन द्वारा रचित महाकाव्य ‘अनुबंध’ इसी अदृश्य सूत्र की खोज है।

काव्य का मूल भाव: ‘कर लिया था चयन’

कविता की पंक्तियाँ हैं: “कर लिया था चयन, बिना बताये ही चयन, मीन को बींध कर, हो रहा था वरण। सूत समझा पृथक पात्रता हो गयी, ब्याह होता रचाता महावर चरण। तुम हुए परसती, मैं हुआ सूत-सुत, तुम जनन बन गए, मैं मरण बन गया।”

ये पंक्तियाँ केवल शब्द नहीं, बल्कि एक अनुभूत सत्य हैं। यहाँ ‘चयन’ (Selection) का अर्थ केवल एक चुनाव नहीं, बल्कि आत्मा का एक पूर्व-निर्धारित निर्णय है। जिस प्रकार प्राचीन काल में स्वयंवर के समय ‘मीन’ (मछली) को बींधकर लक्ष्य प्राप्ति की जाती थी, उसी प्रकार जीवन में जब हम अपने वास्तविक उद्देश्य या अपने आत्मिक साथी को पहचान लेते हैं, तो वह ‘वरण’ स्वतः हो जाता है। हमें किसी को बताने की आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि वह नियति पहले ही तय हो चुकी होती है।

कर-लिया-था-बताये-बिना , Anubandh Epilogue | Kavys Shrinkhla
Sagar Suman Studio , Pustakvani

पात्रता का प्रश्न और सामाजिक आयाम

समाज अक्सर ‘पात्रता’ (Eligibility) के तराजू पर रिश्तों को तौलता है। ‘सूत’ (धागा) यहाँ सामाजिक बंदिशों और सीमाओं का प्रतीक है। कविता में ‘सूत समझा पृथक पात्रता हो गयी’—यह पंक्ति उस मिथक को तोड़ती है कि रिश्ते केवल समान परिस्थितियों में ही पनपते हैं। जब आत्मा का अनुबंध जुड़ता है, तो पात्रता की सारी दीवारें गिर जाती हैं। यह ‘ब्याह’ एक लौकिक विवाह नहीं, बल्कि चेतना का मिलन है। पैरों में रचे महावर का लाल रंग केवल श्रृंगार नहीं, बल्कि उस परिणय का प्रमाण है जहाँ दो अस्तित्व एक होकर नए प्राण का संचार करते हैं।

आध्यात्मिक आयाम: सृजन और मरण का संतुलन

अध्यात्म के बिना साहित्य अधूरा है, और ‘अनुबंध’ इस कमी को पूरी करता है। यहाँ नायक कहता है—“तुम जनन बन गए, मैं मरण बन गया।”

यह वेदांत के उस गूढ़ रहस्य की ओर संकेत है जहाँ ‘स्व’ (अहंकार) का अंत ही परमात्मा (सृजन) का उदय है। जब वह (परमात्मा या प्रिय) मुझे स्पर्श (परसती) करता है, तो मैं ‘सूत-सुत’ हो जाता हूँ—अर्थात मैं उस धागे (माया) से मुक्त हो जाता हूँ जिससे मैं अब तक बंधा था। यह मिलन ‘मरण’ है, लेकिन यह देह का मरण नहीं, बल्कि उस ‘मैं’ का मरण है जो मुझे तुमसे अलग करता था। यह ‘अहं’ का विसर्जन है, जो मोक्ष की ओर ले जाता है।

छंद और अनुशासन का महत्व

सागर सुमन के लेखन की सबसे बड़ी विशेषता है ‘शास्त्रों का अनुपालन’। आज के दौर में जब ‘मुक्त छंद’ (Free Verse) का बोलबाला है, ‘अनुबंध’ का ‘स्रग्विणी छंद’ (Sragvini Chhand) में रचा जाना यह सिद्ध करता है कि अनुशासन ही कला को अमर बनाता है। ‘गण अनुशासन’ (गण-विधान) का सख्ती से पालन करते हुए भी भावों की जो तरलता यहाँ दिखती है, वह साहित्य में एक दुर्लभ उदाहरण है। यह ‘शुद्ध शास्त्रीय नियम’ ही है जो इस काव्य को केवल एक कविता से ऊपर उठाकर एक ‘महाग्रंथ’ की श्रेणी में खड़ा करता है।

सागर सुमन स्टूडियो और दृश्य माध्यम की शक्ति

साहित्य को जब दृश्य (Visuals) का साथ मिलता है, तो वह पाठकों के मन पर अमिट छाप छोड़ता है। सागर सुमन स्टूडियो के माध्यम से, ‘अनुबंध’ की हर पंक्ति को आधुनिक तकनीकी उपकरणों (जैसे Wondershare Filmora, 4K/8K रेंडरिंग) के माध्यम से एक नया आयाम दिया गया है।

हमारी visual storytelling में हम ‘ईस्ट लंदन’ (East London, South Africa) के तटों, ऐतिहासिक पुलों और वहाँ के शांत समुद्र को एक कैनवास के रूप में चुनते हैं। वह नीलम जैसा नीला समुद्र, वह ठंडी हवा और समुद्र की लहरें—ये सभी तत्व उस ‘अनुबंध’ की शांति और गंभीरता को दर्शाते हैं। Samidha जैसी जीवंत आकृतियों के माध्यम से हम उन भावों को मूर्त रूप देते हैं जो शब्दों से परे हैं।

निष्कर्ष: आपका और हमारा ‘अनुबंध’

‘अनुबंध’ केवल मेरी रचना नहीं है, बल्कि यह आप सभी पाठकों के साथ साझा किया गया एक अनुभव है। जब आप इस कविता को सुनते हैं, तब आप केवल मेरे शब्दों को नहीं सुन रहे होते, बल्कि आप अपने भीतर की उस खामोश यात्रा को सुन रहे होते हैं।

पुस्तवाणी और सागर सुमन स्टूडियो का उद्देश्य है—साहित्य को उसकी शुद्धता के साथ, डिजिटल युग की आधुनिकता के साथ जोड़ना। हम चाहते हैं कि आने वाली पीढ़ी भी उस ‘गण अनुशासन’ को पहचाने जो हमारे पूर्वज ऋषि-मुनियों ने हमें छंदों के माध्यम से दिया था।

आप क्या सोचते हैं? क्या आपके जीवन में भी कभी ऐसा कोई पल आया है, जहाँ आपको लगा हो कि नियति ने पहले ही कोई ‘अनुबंध’ तय कर रखा था? अपने विचारों को साझा करें। यह संवाद ही साहित्य को जीवंत रखता है।

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